जीवन को व्यर्थ न जानें दें, बनें बेसहारों का सहारा
- Rajendra Kumar Nema

- 20 फ़र॰ 2024
- 3 मिनट पठन
अपडेट करने की तारीख: 21 फ़र॰ 2024
यदि जिये तो क्या जिये , जो स्वयं के लिए जिये ।
यदि जिये तो क्या जिये , जो स्वयं के लिए जिये ।
मरे तो क्या मरे जो स्वयं के लिये मरे ।।
आजकल यह देखा जा रहा है कि अधिकांश लोग केवल अपने परिवार एवं बच्चों के लिये ज्यादा से ज्यादा धन संग्रह करने एवं उनके जीवन यापन में ही अपना संपूर्ण जीवन लगा देते हैं । यदि हम इससे हटकर थोड़ा आजु-बाजु में देखने एवं समझने की कोशिश करें तो हमें अहसास होगा कि ईश्वर ने हमें परिवार के अलावा बहुत सारी जिम्मेदारियाँ दी हैं । यदि देश का सक्षम वर्ग अपनी कमाई का थोड़ा सा हिस्सा भी समाजिक कार्यों में लगा दें तो समाज का गरीब/पीड़ितवर्ग उपर उठ सकता है ।
यदि हम दिव्यांगों के बारे में बात करें तो हम देखेंगे कि मंद बुद्धि बच्चों की तकलीफ़ों एवं बीमारियों की जानकारी के अभाव में, ये समाज में हमेशा उपेक्षित रहे हैं । आम लोगों में यह धारणा है कि जब मंद बुद्धि बच्चे पूर्णरूप से स्वस्थ नहीं होते या परिणाम प्राप्त नहीं होता तो इनके साथ काम करने का कोई मतलब नहीं है । परंतु यह सोच गलत है । विगत 12 वर्षों से इन बच्चों के लिये काम करते हुये मैने देखा है कि 60% मंद बुद्धि बच्चों को इनकी जरूरत के अनुसार थेरेपी, सुविधाएं, क्रियाकलाप (activity base) ट्रेनिंग 8 से 10 साल प्रदान करने से जो विकास होता है, उसके कारण ये अपना बाकी जीवन समाज के बीच में रहकर, अपना काम खुद करके, अपना जीवनयापन करने में सक्षम हो जाते हैं एवं अच्छे बुरे को समझने की शक्ति बढ़ जाती है ।
इनकी उपेक्षा का मुख्य कारण है, अविकसित दिमाग एवं अभिव्यक्ति की क्षमता (सोचने, पढ़ने एवं अपनी पीड़ा बताने की क्षमता) न होने के कारण अपनी समस्याओं को अन्य दिव्यांग बच्चों की तरह किसी भी मंच पर नहीं पाना, ये अपनी बाते समाज, मीडिया एवं सरकार के समक्ष रखने में असमर्थ रहते हैं , न तो इनको नौकरी मिलती है न ही समुचित इलाज , न ही इनकी शादी विवाह हो पाते हैं । इसके कारण ये हीन भावना से ग्रसित हो जाते हैं एवं इनका जीवन अभिशाप बन जाता है। युवा होने के पश्चात 30 से 35 की उम्र के बाद ये विक्षिप्तों के समान व्यवहार करने लगते हैं एवं समझ की कमी के कारण कई बार असमाजिकता का शिकार भी हो जाते हैं । इनके लिये हास्टल, विशेष शिक्षा, स्पीच एवं फिजियोथेरेपी की उपलब्धता की जरूरत है। इनके साथ काम करना कठिन एवं खर्चीला अवश्य है , क्योंकि ये कई बीमारियों से ग्रसित रहते हैं परंतु यदि हम सक्षम हैं तो हमें अवश्य मंद बुद्धि बच्चों के लिये काम करना चाहिये । ये समस्या समाज के हर वर्ग में है, परन्तु समाज के निम्न आय वर्ग में बहुत गंभीर हो जाती है । इनके अभिभावक निम्न आय वर्ग के होने के कारण मजबूरीवश अपनी रोज़मर्रा की जरूरतों के इंतजाम में लगे रहते हैं एवं स्कूल में आने-जाने की असुविधा के कारण इन बच्चों को विशेष स्कूलों में भेजने एवं इलाज (मुख्यतः फिजियो एवं स्पीच) करने में असमर्थ रहते हैं । जिससे मंद बुद्धि बच्चे घर में पड़े पड़े तनावग्रस्त एवं हाइपर हो जाते हैं ।
इन्ही सब समस्याओं के निदान हेतु आँचल विकलांग पुनर्वास केन्द्र की स्थापना की गई । कोई भी अनुदान प्राप्त न होने के बावजूद विगत 12 वर्षों से निम्न आय वर्ग के बच्चों को स्पीचथैरेपी, फिजियोथैरेपी, स्पेशल कक्षाओं, योगा एवम बिहेवियर थैरेपी की शिक्षा, नृत्य एवं ड्राइंग, स्कूल आने जाने की व्यवस्था तथा मेडिकल की सुविधा निःशुल्क प्रदान कर रही है ।
मैं यहाँ यह जरूर बोलना चाहूँगा कि हममें से अधिकांश लोग केवल अपने परिवार एवम बच्चों के जीवन यापन, धनार्जन आदि में ही सारी उम्र लगाकर अपने जीवन को व्यर्थ कर देते हैं । यहाँ तक की वे इस धन का संपूर्ण उपयोग भी नहीं कर पाते क्योंकि जीवन का अंत किसी को नहीं पता होता ।
धन एवं समय दे सकते हैं तो आप भी विकलांग बच्चों हेतु, अपने धन , समय एवं एकाकी रिटायर्ड जीवन का सही उपयोग कर सकते हैं । यह हमारा कर्त्तव्य भी है की हम समाज के इस उपेक्षित तबके को समाज के मुख्या धारा से जोड़ने के लिए अपना सहयोग दें । अपने सम्पूर्ण जीवन काल में कुछ इस तरह का कार्य अवश्य करके जाएँ जो दिव्यांग एवं बेसहारों के लिये जीवन जीने का आधार बने ।
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